हाइरार्की इन टॉक्सिसिटी (Mumbai Diaries Series)
१०/९/२०१९
शाम के करीब साडे छ का वक्त रहा होगा जब मैं आज ऑफिस से निकला। अमूमन जिस जगह से मुझे ऑटो रिक्शा मिल सकती है रेलवे स्टेशन जाने के लिए वैसे स्थानक पांचसो से सातसो मीटर की दूरी पर है और उतना अंतर पैदल चल कर ही काटना पड़ता है। ‘पड़ता है’ शब्द का इस्तेमाल करने की वजह ये है की आजकल शारीरिक एक्सरसाइज़ का प्रमाण काफी कम हो गया है| बाकी इतनी दूरी एक नौजवान के लिए ज्यादा नहीं होनी चाहिए।
खैर, मैं चल रहा था रास्ते पर तो मुझे आज वाहनों की भीड़ के साथ साथ लोगों की भीड़ भी नजर में आई जो की आम तौर पे कम रहती हैं क्यूंकि वाहनों में बैठे लोगो ने जगह बचाई ही नहीं होती है। मैं थोड़ा दूर था भीड़ से और लोग इतने थे की मेरी द्रष्टि उसमें से कुछ निष्कर्ष निकलने को असमर्थ रही। एक बड़ी-सी गाड़ी एक गराज के पास खड़ी थी और उसी के अगल बगल सारे लोग जमा होकर घट रही घटना का तमाशा देख कर अपना यथाशक्ति योगदान दे रहे थे। दिखावे में ज्यादातर लोग मजदूर, ऑटो ड्राइवर्स और गराज के कारीगर ही लगे। बाकी के लोग राहदारी प्रतीत हो रहे थे। मैं बिना रुके चल रहा था फिर भी गति थोड़ी कम ही थी, रास्ते में ट्राफिक जाम में रुके वाहन और लोगो की बढ़ती भीड़ के कारण। वो बड़ी-सी गाड़ी कौन-सी थी वो न तो मुझे याद है न तो मैं उस वक्त पहचान सका था। गाड़ियों की परख में मेरी क्षमता थोड़ी कम हैं।
जैसे ही मैं थोड़ा करीब पहुंचा की मैंने देखा की गाड़ी में बैठे एक आदमी ने रिक्शाचालक का परिवेश धारण किये हुए एक आदमी को उसके शर्ट की कोलर से पकड़ के रखा था और गुस्से में कुछ बके जा रहा था। उनकी आजू-बाजू में जितने भी लोग शामिल थे उसमे सबसे ज्यादा रिक्शाचालक ही नजर पड़ते थे और आश्चर्य की बात ये थी की वे कोई अपने साथी की मदद के लिए जबान नहीं खोले हुए थे। असल में मुद्दा क्या था और ऐसा तो क्या घटित हुआ था की एक आदमी कार में बैठकर आर्थिक रूप से निम्न वर्ग के आदमी को धमकाए जा रहा था और लोग चुप्पी लगाए बैठे थे। मुझे वहाँ पे हो रही बातचीत सुनाई नहीं दे रही थी पर रिक्शाचालक की आँखों में भय, आंसू, लाचारी इत्यादि दूर से भी दिखाई पड़े। मैं थोड़ा सहम गया। मुझे एक पल के लिए उस पर दया और गाड़ी वाले आदमी पर गुस्सा आ गया पर तुरंत ही मैंने सोचा की मैं तो पूरी तरह से घटना से वाकिफ भी नहीं हूँ। पर साथ ही ये ख्याल भी मन में आ कर बस गया की भले ही कुछ भी किया हो इस तरीके की जिल्लत का हक़दार वो रिक्शाचालक होना चाहिए की नहीं।
मैं इस प्रकार के विचारो की असमंजस में था की तभी वो गाड़ी चलने लगी और आगे का द्रश्य देख मेरी आँखे विश्वास न कर पायी। उस रिक्शाचालक को अंदर बैठे आदमी ने ज्यों का त्यों पकड़ रखा था और फिर भी उसके बाजु में बैठे आदमी ने गाड़ी चलानी शुरू कर दी थी। इस तरीके से पकड़ के रखने के कारण वो रिक्शाचालक जमीन से थोड़ा ऊपर उठ चूका था और उसकी गर्दन को कुछ भी हो सकता था। उसके पाँव भी निचे जमीन को खोज रहे थे पर वो मुख्यत: असफल रहा। ट्राफिक जाम था इस लिए गाड़ी ज्यादा गति से आगे नहीं बढ़ पा रही थी नहीं तो न जाने उस आदमी के साथ क्या-क्या हो जाता। मैं खुद को समेटने लगा हिम्मत के साथ की कहीं मुझे विरोध करना पड गया तो। मैं ये सोचने लगा की मैं क्या कर सकता हूँ इस परिस्थिति में उस रिक्शाचालक की मदद करने के लिए और अगर हड़बड़ी में कुछ और हो गया तो इसके बाद क्या कर सकता हूँ। पर फिर मैं थोड़ी क्षणों में ही खुश हो गया क्यूंकि उस गाड़ी वाले आदमी ने रिक्शाचालक को छोड़ दिया। गाड़ी और रिक्शाचालक दोनों को थोड़ी और जमीन नसीब हुई। गाड़ी और स्पीड में भागने लगी और रिक्शाचालक भी खड़ा होकर दूसरी दिशा में खुद के लिए रास्ता खोजते अपने पांवो को निर्देश देते हुए आगे चल पड़ा।
पर ये किस्सा यहीं पर ख़त्म नहीं होता। अगर हो जाता तो शायद मैं आपको ये किस्सा सुनाता भी नहीं पर जो बात कहने के लिए मैंने ये लिखना चालू किया है उसके मुख्य अंश अब आते है।
मैंने भी अपनी गति बढ़ा ली थी। वो रिक्शाचालक अब थोड़ा भयमुक्त नजर आ रहा था। पर वो बस तीन से चार कदम ही आगे चला होगा की उसे एक अपाहिज आदमी दिखाई दिया जो रास्ते के किनारे लकड़ी के एक छोटे टुकड़े के निचे ४ पहिये लगाए हुए अपने वाहन पे धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। ऐसे लोगो को देख के भी मेरा हृदय चलित हो उठता है। उनकी भी एक कहानी होती होगी। पर ऐसे लोग हमें नजर पड जाते है तो ज्यादा अजीब नहीं लगता। पर जो चीज मुझे पुरे तरीके से चौंका गयी वो ये थी की इस अपाहिज आदमी को अपनी और आते देख वो रिक्शाचालक भन्ना गया और किसी को कुछ समज आये उससे पहले अपना हाथ हवा में ऊपर उठाकर जोर से उसने एक चाँटा उस अपाहिज आदमी के गलो पे झड़ दिया। मेरे पांव थम गए। मैं भावविहीन बन देखने लगा। मुझसे कई गुना ख़राब हालत वो अपाहिज आदमी की थी। वो पलट कर रिक्शाचालक को भीड़ चीरते आगे जाते हुए देखने लगा। वो समज न पाया था उस पर हिंसा होने का कारण और न ही वो उसकी प्रतिक्रिया देने के काबिल था। वो तेजी से रिक्शाचालक का पीछा नहीं कर सकता था। उसने अपने वाहन को स्थिर कर दिया और शायद अपने मन को दौड़ाने लगा।
ये द्रश्य देखने में और लोगो के साथ वो रिक्शाचालक भी थे जो की अपने अपने रास्ते की और जाने के लिए कदम बढ़ा चुके थे पर एक अपाहिज पर अत्याचार होते देख वे ३-४ लोग उस रिक्शाचालक की और धस गए। वो ज्यादा दूर नहीं पहुँच पाया था। इन लोगो ने उसे पीछे से धर दबोचा। उसे बिना कुछ पूछे मारने लगे। उस रिक्शाचालक ने उस अपाहिज को मारने से पहले कुछ सोचा होगा या नहीं या क्या सोचा होगा ये तो मुझे नहीं पता पर ये तो बिलकुल नहीं सोचा होगा की पुरे घटनाक्रम में फिर से उसी की धुलाई हो जाएगी। रिक्शाचालक को भी अपना गुस्सा ही किसी पर निकालना होगा शायद इसी लिए उस अपाहिज पर हाथ उठाया होगा। पर जो लोग कुछ मिनिट पहले उस के लिए दयाभाव रख बाजु में खड़े थे वो ही उसे पिट रहे थे। रिक्शाचालक अपने बचाव में कहने लगा, ‘वो मेरा दोस्त ही है’। वो अपाहिज उसका दोस्त है की नहीं इस बात से मुझे कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ा क्यूंकि बेशक ही कोई अपने दोस्त को रस्ते पर सामने आते देख बेवजह पीटने नहीं लगता। वे लोग इसे पिटते हुए उस अपाहिज की और ले जाने लगे। कुछ २ से ३ मिनिट के अंतराल में ही मेरे सामने घटनाक्रम काफी बदलता रहा। पर अब मैंने उस और बिना देखे खुद की चलने की गति बढ़ा ली क्यूंकि मेरे मन में काफी सवाल थे और उस हर एक के पीछे काफी प्रकार के विचार थे जिसे कार्यरत करने और समझने के लिए मुझे वहाँ से निकलना ही उचित लगा।
मेरा दिमाग इन खयालो से भर गया की एक गाड़ी वाला व्यक्ति खुल्ले आम एक गरीब रिक्शाचालक को गाड़ी के साथ घसीट के कोलर पकड़ के जमीन से यूँ ऊपर उठाकर ले जा सकता है, वो ही रिक्शाचालक चंद क्षण के बाद ही अपना गुस्सा एक अपाहिज व्यक्ति पर निकाल सकता है और उस रिक्शाचालक के साथी ही उसे ऐसी हरकत के बदले में एक साथ मिलकर पीट भी सकते है। अब सवाल ये भी है की क्या उसके साथियो को अपाहिज के साथ जो हुआ उसका गुस्सा था या बस उन्होंने मौकापरस्त बनकर अपना रोजमर्रा का क्रोध उस आदमी के बदन पर उंडेल दिया? क्यूंकि अपने साथी को मारने की वजह अगर अपाहिज पर दया थी तो उनका साथी भी तो कुछ वक्त पहले उस अपाहिज के स्थान पर ही था पर तब उन्होंने स्वयं न्यायधीश बनना मुलतवी रखा हुआ था।



Comments
Post a Comment